नई दिल्ली: 4 अगस्त, 1983 को एक फिल्म रिलीज हुई थी। नाम था- अंधा कानून। अमिताभ बच्चन, रजनीकांत और हेमा मालिनी अभिनीत इस फिल्म का टाइटल सॉन्ग काफी मशहूर हुआ- ये अंधा कानून है… मशहूर संगीतकार आनंद बख्शी ने कोर्ट-कचहरी, वकील-दलील, सुनवाई-फैसले के हालात को शब्द दिए तो किशोर कुमार ने उसे अपनी आवाज देकर कानून को लेकर जन-जन की पुकार माननीयों तक पहुंचा दी। एक जगह किशोर गाते हैं- अस्मतें लुटीं, चली गोली, इसने आंख नहीं खोली। फिर वो कहते हैं- लंबे इसके हाथ सही, ताकत इसके साथ सही। पर ये देख नहीं सकता, ये बिन देखे है लिखता।
आखिर किसे नहीं पता कि इस देश में सड़क से लेकर अदालत तक, हर जगह कानून की धज्जियां उड़ती हैं और न्याय की देवी यूं ही स्टैच्यू बनी रहती हैं। कोई हरकत नहीं, बिल्कुल संवेदनहीन। सड़कों पर कानून तमाशबीन बनकर खड़ा है, थाने में वह उगाही और उत्पीड़न का अस्त्र बना है तो अदालतों में दलीलों और तारीखों की बेइंतहा ऊबाऊ प्रक्रिया का ऐसा ऑक्टोपस है ये, जिसकी जकड़न में गए तो खैर नहीं।
करीब 80 हजार मुकदमों की ढेर सुप्रीम कोर्ट में ही लगी है। फिर भी अब अंधा कानून कहने की हिमाकत नहीं कीजिएगा महोदय, न्याय की देवी अब सबकुछ देख जो सकती हैं। अब तक अंधे कानून की त्रासदी न्याय की देवी देख नहीं पाती थीं, अब वो खुली आंखों से सब देखेंगी। कम-से-कम उम्मीद तो कर ही सकते हैं कि देख पाने के कारण न्याय की देवी की मूर्ति में भी संवेदना जग जाए। जस्टिस चंद्रचूड़ ने वाकई अच्छी पहल की है।
Author: kesarianews
शैलेन्द्र मिश्रा वरिष्ठ पत्रकार एवं फाउंडर – केसरिया न्यूज़। राजनीति, प्रशासन और जनहित से जुड़े मुद्दों पर तथ्यपरक, निर्भीक और ज़मीनी रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं।
