“मासूमों का कातिल बना कफ सिरप: मध्य प्रदेश में 10 बच्चों की मौत की अनसुनी कहानी”
“ज़हर बनी दवा: छिंदवाड़ा में बच्चों की मौत और सिस्टम की नाकामी का सच”
“कफ सिरप की त्रासदी: मध्य प्रदेश में मासूमों की जान लेता नकली दवा का खेल”
04/10/2025 भोपाल….
मध्य प्रदेश में जहरीले कफ सिरप का कहर: मासूमों की मौतें और सिस्टम की पोल खोलती त्रासदी। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से एक दिल दहलाने वाली खबर ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है। सितंबर 2025 से शुरू हुआ मौतों का सिलसिला अब तक 9 से 10 बच्चों की जान ले चुका है, जिनकी उम्र 1 से 7 साल के बीच थी। इन मौतों का कारण बना खांसी का सिरप—कोल्ड्रिफ और नेक्सट्रॉस डीएस—जिनमें डायएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) जैसे जहरीले रसायन की मौजूदगी का संदेह है। यह रसायन किडनी फेलियर का कारण बन रहा है, जिसने मासूमों की जिंदगियां छीन लीं। यह त्रासदी न केवल एक स्वास्थ्य संकट है, बल्कि दवा नियंत्रण, सरकारी लापरवाही और नकली दवाओं के काले कारोबार की गहरी खाई को उजागर करती है।
त्रासदी की शुरुआत: वायरल बुखार से कब्र तकअगस्त 2025 में छिंदवाड़ा के परासिया क्षेत्र में भारी बारिश के बाद वायरल बुखार और सर्दी-खांसी के मामले बढ़े। माता-पिता ने अपने बच्चों को स्थानीय डॉक्टरों या झोलाछाप वैद्यकों के पास ले जाकर इलाज शुरू किया। उन्हें कोल्ड्रिफ और नेक्सट्रॉस डीएस जैसे कफ सिरप दिए गए, जो सामान्य सर्दी-खांसी के लिए आम हैं। लेकिन जल्द ही बच्चों में खतरनाक लक्षण दिखने लगे—पेशाब रुकना, उल्टी, शरीर में सूजन और तेज बुखार। ये लक्षण किडनी इंफेक्शन और डायएथिलीन ग्लाइकॉल विषाक्तता की ओर इशारा कर रहे थे।4 सितंबर को पहली मौत दर्ज हुई। इसके बाद सितंबर के अंत तक 6 बच्चों की जान चली गई, और अक्टूबर 2025 तक यह संख्या 9-10 तक पहुंच गई। प्रभावित बच्चे ज्यादातर परासिया और आसपास के गांवों जैसे मोर डोंगरी से थे।

कई बच्चों को पहले स्थानीय अस्पतालों में भर्ती किया गया, फिर नागपुर के अस्पतालों में रेफर किया गया, लेकिन देरी और विषाक्तता के कारण ज्यादातर को बचाया न जा सका। वर्तमान में 13-15 बच्चे अभी भी अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं। परिजनों का गुस्सा और दर्द छलक रहा है। एक पिता ने कहा, “मेरे बच्चे को सिर्फ सर्दी थी, सिरप पिलाने के बाद उसकी हालत बिगड़ती चली गई।” यह त्रासदी मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं रही। राजस्थान के भरतपुर और सीकर में भी इसी तरह की घटनाएं सामने आईं, जहां 2 और बच्चों की मौत हुई, जिससे कुल प्रभावित बच्चों की संख्या 11-12 तक पहुंच गई। जहर का स्रोत: DEG और दवा उद्योग की काली हकीकतजांच में सामने आया कि कोल्ड्रिफ और नेक्सट्रॉस डीएस जैसे सिरप में डायएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) की मौजूदगी हो सकती है। यह एक औद्योगिक रसायन है, जिसे सस्ते ग्लिसरीन के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन यह किडनी और अन्य अंगों को पूरी तरह नष्ट कर सकता है, खासकर बच्चों में। तमिलनाडु की एक कंपनी द्वारा निर्मित कोल्ड्रिफ सिरप के सैंपल में DEG की मात्रा सीमा से अधिक पाई गई, जिसके बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान और अन्य राज्यों ने इस सिरप पर प्रतिबंध लगा दिया। यह कोई नई समस्या नहीं है। 2022-23 में गाम्बिया और उज्बेकिस्तान में भारतीय कफ सिरप से सैकड़ों बच्चों की मौत हुई थी, जिसके बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत की दवा गुणवत्ता पर सवाल उठाए थे।
मध्य प्रदेश में सरकारी दवा खरीद प्रक्रिया की खामियां भी सामने आई हैं। CAG की एक रिपोर्ट के अनुसार, कई दवाएं अमानक थीं और कुछ तो एक्सपायर हो चुकी थीं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने 2 साल से कम उम्र के बच्चों को कफ सिरप न देने की सलाह दी है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका पालन कितना हो रहा है, यह सवाल बना हुआ है। प्रशासन की लापरवाही: सवालों के घेरे में सरकारइस त्रासदी ने मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है। स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला ने शुरुआत में मौतों को सिरप से जोड़ने से इनकार किया, जिससे भ्रम और गुस्सा बढ़ा। जिला प्रशासन ने कोल्ड्रिफ और अन्य सिरप बैन तो किए, लेकिन सैंपल जांच में देरी हुई। प्रोटोकॉल के अनुसार 72 घंटे में जांच होनी चाहिए थी, लेकिन इसमें 6 दिन लग गए। NCDC और ICMR की टीमें जांच में जुटी हैं, लेकिन शुरुआती रिपोर्टों में कुछ सिरप को क्लीन चिट देने से विवाद और गहराया। मध्य प्रदेश में शिशु मृत्यु दर पहले से ही चिंताजनक है। 2023 की SRS रिपोर्ट के अनुसार, 0-4 साल के बच्चों की मृत्यु दर में मध्य प्रदेश देश में दूसरे स्थान पर है। इसके बावजूद, दवा गुणवत्ता और झोलाछाप डॉक्टरों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। विपक्षी नेता जैसे कमल नाथ और उमंग सिंहर ने सरकार पर निशाना साधते हुए 50 लाख मुआवजा और न्यायिक जांच की मांग की है।
सवाल यह है कि नकली दवाओं का बाजार इतना बेलगाम क्यों है? सरकारी खरीद में भ्रष्टाचार और लापरवाही की जड़ तक क्यों नहीं पहुंचा जा रहा?
- प्रभावित परिवारों का दर्दइस त्रासदी ने कई परिवारों को तोड़ दिया। शिवम, विधि, अदनान जैसे बच्चों के नाम अब केवल यादों में बचे हैं। एक मां ने रोते हुए कहा, “मैंने अपने बच्चे को दवा दी थी ठीक करने के लिए, लेकिन वह जहर निकली।” परासिया के मोर डोंगरी जैसे गांवों में मातम पसरा है। कई परिवार गरीब हैं, जो इलाज के लिए नागपुर तक का खर्च नहीं उठा सकते।
- आगे की राह: सुधार और जवाबदेही जरूरीयह त्रासदी दवा नियंत्रण और स्वास्थ्य व्यवस्था में तत्काल सुधार की मांग करती है। केंद्र सरकार ने राज्यों को सख्त दवा जांच और निगरानी की एडवाइजरी जारी की है, लेकिन मध्य प्रदेश को अपनी दवा सैंपलिंग लैब्स को मजबूत करना होगा। झोलाछाप डॉक्टरों पर सख्ती और माता-पिता को जागरूक करना भी जरूरी है।
- प्रभावित परिवारों को 50 लाख का मुआवजा और मुफ्त इलाज देना सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है।यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी का नंगा सच है।
- अगर अब भी सुधार न हुए, तो शिवम, विधि और अदनान जैसे मासूमों की बलि का सिलसिला थमेगा नहीं। सरकार को अब कार्रवाई दिखानी होगी, ताकि कोई और मां-बाप अपने लाडले को इस तरह न खोए।
Author: kesarianews
शैलेन्द्र मिश्रा वरिष्ठ पत्रकार एवं फाउंडर – केसरिया न्यूज़। राजनीति, प्रशासन और जनहित से जुड़े मुद्दों पर तथ्यपरक, निर्भीक और ज़मीनी रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं।

