भितरघात से बनी सरकार को भितरघात का डर..
28/मई/2020
होशंगाबाद आलोक हरदेनिया
भोपाल – मध्यप्रदेश में सिंधिया समर्थक 22 कांग्रेसी विधायको के इस्तीफे (भितरघात) से पुनः मुख्यमंत्री बने शिवराज सिंह को प्रदेश की सत्ता के सिंहासन पर काबिज हुए 2 माह पूरे हो गये है। पहला एक माह तो कोरोना संकट और लॉक डाउन के बीच शिवराज सिंह ने बिना मंत्री बनाये ही सरकार चलाई। और विपक्ष के ट्वीटर बार के बाद 2 सिंधिया समर्थकों समेत 5 मंत्री को शपथ दिलाई गई। हालांकि इस मंत्रिमंडल बनाने में सबसे चौकाने वाली बात तो यह रही कमलनाथ सरकार के समय नेता प्रतिपक्ष रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता गोपाल भार्गव को इसमें शामिल नही किया गया। जबकि सागर संभाग से सिंधिया समर्थक गोविंद राजपूत को बिना विधायक के ही मंत्री बनाने ने सागर संभाग की राजनीति में कुछ नये समीकरण की और इशारा जरूर किया। लेकिन भाजपा के सूत्र बताते है आने वाले दिनों में होने जा रहे मंत्रिमंडल विस्तार में गोपाल भार्गव को स्थान दिया जायेगा। शिवराज सरकार में मंत्रीमंडल विस्तार को लेकर माथापच्ची जारी है। कि किस किस नेता को मंत्री बनाया जाये।अपनी अनदेखी का आरोप लगाते हुए कांग्रेस से इस्तीफे देकर भाजपा में शामिल हुए 20 पूर्व विधायक सरकार में मंत्री बनने को लेकर वेटिंग में है। लेकिन हो सकता है कि मंत्री पद की चाह रखने वालों को अभी और इंतजार करना पड़े क्योकि राजभवन के 7 लोग कोरोना से संक्रमित है ,इसी वजह से यह विस्तार कुछ समय के लिए आगे बढ़ने की संभावना दिख रही है । वही 2018 के विधानसभा चुनाव में हार का मुंह देखने वाले भाजपा नेता उपचुनाव में फिर से टिकट की मांगकर पार्टी संगठन को पसोपेश में डाल रहे है। भाजपा सरकार और संगठन के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती मंत्री मंडल विस्तार और विधानसभा उपचुनाव जीतने की है।
वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा….. भितरघात का डर……
भाजपा ने तात्कालिक लाभ देखते हुए प्रदेश में सरकार तो बना ली । लेकिन तात्कालिक लाभ और दीर्घकालिक लाभ में अंतर होता है। जिस प्रकार से पहले काम चलाऊ मंत्रीमंडल में पार्टी के वरिष्ठ नेता गोपाल भार्गव को मंत्रिमंडल जगह नही दी गई जिससे उनकी उपेक्षा का मैसेज जनता को साफ तौर पर मिला। गोपाल भार्गव का जनता से सीधा संपर्क है वह जनाधार वाले नेता है । सागर संभाग में पार्टी संगठन को मजबूत करने में अहम भूमिका भार्गव की रही है। बात अगर पूर्व मुख्यमंत्री प्रदेश की राजनीति में संत कहे जाने वाले स्व, कैलाश जोशी के पुत्र की करे तो वह 2018 का विधानसभा चुनाव मनोज चौधरी से हार गये। मनोज चौधरी कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा में आ गये । और भाजपा मनोज चौधरी को टिकट देकर चुनाव लड़ाने का मन बना चुकी है। जिसके चलते पूर्व मंत्री दीपक जोशी के समर्थक उपेक्षित महसूस कर रहे है।होशंगाबाद जिले के सबसे वरिष्ठ विधायक सीताशरण शर्मा को भी पहले मंत्रिमंडल में स्थान नही मिला है।
भाजपा संगठन की मजबूती का सबसे अहम कारण यह है कि पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं का सीधा जनता से संपर्क और संवाद है। लेकिन तात्कालिक लाभ को देखते हुए पार्टी उपचुनाव में पैराशूट लैंडिंग से पार्टी में शामिल हुए नेताओ को टिकिट देकर चुनाव लड़ाने का मन बना चुकी है। जिससे उपचुनाव होने वाले स्थान के भाजपा नेता उपेक्षित महसूस कर रहे है, और कांग्रेस इसी उपेक्षा का फायदा उठाने की कोशिश करेगी। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष वी,डी, शर्मा के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती उपचुनाव वाले स्थान पर उपचुनाव के पहले ही पार्टी अपने वरिष्ठ नेताओं को मनाकर सिंधिया समर्थकों के लिए उपचुनाव में ईमानदारी से काम करने के लिए तैयार करने की है। जिससे वह आसानी से चुनाव जीत सके । लेकिन यह इतना आसान काम नही है। सबसे ज्यादा माथापच्ची संगठन को सुरखी, सांची, सांवेर, ग्वालियर भिंड संभाग की कई विधानसभा सीटों पर करनी है। क्योंकि पार्टी को इन सीटों पर भितरघात का डर भी सता रहा है।
दिग्विजयसिंह और कमलनाथ के बीच वर्चस्व का संघर्ष
कांग्रेस के सामने भी उपचुनाव विधानसभा सीटे जीतना इतना आसान नही है क्योंकि दिग्विजयसिंह और कमलनाथ में कई मौकों पर वर्चस्व के लिए संघर्ष साफ देखा गया है। कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थामने वाले विधायक बिसाहलाल सिंह दिग्विजयसिंह समर्थक ही माने जाते थे। और मंत्री नही बनाये जाने से नाराज होकर उन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया है। वही ग्वालियर चंबल संभाग की राजनीति में राजघराने का काफी दखल रहा है। उप चुनाव में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह कैसे तालमेल बैठाकर जीत की राह निश्चित करते है। या एक बार फिर उपचुनाव कांग्रेस की गुटबाजी की भेंट चढ़कर भाजपा को जीत उपहार में मिल जायेगी ये तो उपचुनाव के परिणाम ही बातयेगे
उपचुनाव से तय होगी प्रदेश की राजनीति की नई दिशा
मध्यप्रदेश में 24 स्थानों पर होने वाले उपचुनाव परिणाम प्रदेश की राजनीति को एक नई दिशा देंगे भाजपा के नये प्रदेश अध्यक्ष वी,डी, शर्मा और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के लिए यह उपचुनाव जीतकर भाजपा की सत्ता कायम रखना बड़ी चुनौती होगी । तो वही ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने के बाद कांग्रेस अपने वयोवृद्ध नेता कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के सहारे एक बार फिर उपचुनाव में जीत के लिए पूरी ताकत लगायेंगे जिससे कि कांग्रेस पुनः एक बार फिर सत्ता के सिंहासन पर काबिज हो लेकिन दोनों ही पार्टियों के लिए उपचुनाव में चुनोतियाँ कम नही है। बहरहाल देखने वाली बात होगी कि आखिर उपचुनाव के बाद कौन सी पार्टी की सत्ता प्रदेश में रहेगी।
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Author: kesarianews
शैलेन्द्र मिश्रा वरिष्ठ पत्रकार एवं फाउंडर – केसरिया न्यूज़। राजनीति, प्रशासन और जनहित से जुड़े मुद्दों पर तथ्यपरक, निर्भीक और ज़मीनी रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं।
