नई दिल्ली: ‘चूंकि प्यार और डर एक साथ नहीं मौजूद सकते, अगर हमें उनमें से किसी एक को चुनना पड़े, तो प्यार से डरना कहीं ज़्यादा सुरक्षित है।’ मैकियावेली की किताब ‘द प्रिंस’ में कही ये बात आज की दुनिया की सच्चाई है। दुनिया ऐसे नेताओं को चुन रही है, जिनसे वो डर सकें। पूर्व एंबेसडर रहे राजीव डोगरा की नई किताब Autocrats…Charisma, Power and Their Lives दुनिया के उसी निरंकुश चेहरे को ईमानदारी के साथ आईना दिखाती है, जिसके अक्स में कई देशों की राजनीतिक सत्ताएं समझी और देखी जा सकती हैं।
हमारे आस-पास की दुनिया में ऐसी कई सरकारें हैं, जिनकी बागडोर ऐसे राजनेताओं के हाथ है, जो सालों से सत्ता पर काबिज हैं। वहां कहने को लोकतंत्र भी है, चुनाव भी है लेकिन सिर्फ देखने के लिए। किम जोन उन से लेकर तुर्की में एर्दोआन तक… दुनिया का एक बड़ा हिस्सा ऐसे लार्जर दैन लाइफ का आभामंडल रखने वाले शासकों की मौजूदगी को स्वीकारने के लिए मजबूर है।
एंबेसडर पवन वर्मा ने कहा कि दरअसल इस पैटर्न पर बात करना इसलिए जरूरी है क्योंकि कई देशों की जनता का झुकाव मजबूत लीडरशिप को लेकर देखा जाया जा सकता है। हालांकि उन्होंने इस बात पर जोर भी दिया कि डोगरा अपनी किताब में निराशावादी एटीट्यूड दिखाते हुए लिखते हैं कि वो सुबह कभी तो आएगी। जिस पर जवाब देते हुए लेखक कहते हैं कि ये सही है कि आने वाले समय में भी कई चरणों में निरंकुश और तानाशाह शासन की झलक, दिखती रही है।
कुल मिलाकर ये बातचीत लोकतांत्रिक शासन की कमियों और अपने आंतरिक हितों के मद्देनज़र दोगलेपन को भी कई स्तरों पर सामने लेकर रखती है। सबसे खास बात ये पैनल में सबने माना कि भले ही तानाशाहों का वक्त दौर हो जाता है, उनके शासन के दौरान जन्मी दुखद स्मृतियां धुंधली पड़ जाती हैं, लेकिन ये भी सच है कि किसी तरह लोकतंत्र के मूल्यों में गिरावट के बाद पैदा हुई दरार के जरिए नए सुपरशक्तिशाली निरंकुश शासक राजनीतिक सिस्टम में फिर दाखिल होते हैं और कई सालों तक जड़े जमा लेते हैं।
Author: kesarianews
शैलेन्द्र मिश्रा वरिष्ठ पत्रकार एवं फाउंडर – केसरिया न्यूज़। राजनीति, प्रशासन और जनहित से जुड़े मुद्दों पर तथ्यपरक, निर्भीक और ज़मीनी रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं।
